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Wednesday, 4 January 2012

जब दादामुनी के साथ प्रेतनी ने व्हिस्की पी

यह अपने ज़माने के चर्चित फिल्म अभिनेता दादामुनी यानी अशोक कुमार का भी भूत-प्रेत से पाला  पड़ा था. उन्होंने उस ज़माने की एक  पत्रिका में  कुछ आपबीती घटनाओं के बारे में लिखा था. उनमें से एक घटना यूँ  हुई कि एक बार सूटिंग के बाद वे देर रात अपनी कार से  घर लौट रहे थे. जोरों की बारिश हो रही थी. रह-रहकर बिजली भी कड़क रही थी. गाड़ी चलने में उन्हें परेशानी हो रही थी. उन्होंने सोचा कि क्यों नहीं रस्ते में अपने दोस्त के गेस्ट हॉउस में रुक जाएँ और बारिश रुकने के बाद आगे बढ़ें. उन्होंने कार को गेस्ट हॉउस की तरफ मोड़ लिया. गाड़ी पार्क कर वे अंदर एक कमरे में चले गए. उन्होंने केयर टेकर से कहकर खिड़की के पास टेबुल-कुर्सी लगवा ली. एक जग पानी और ग्लास रखवा लिया. व्हिस्की की एक बोतल निकली और पेग बनाकर शिप करने लगे. तेज़ बारिश के बीच किसी ने दरवाज़ा खटखटाया. दरवाज़ा खोला तो उन्हें वहां एक खूबसूरत सी लड़की पानी से भीगी हुई खड़ी मिली. उसने बताया कि वह लिफ्ट लेकर एक ट्रक पर मुंबई जा रही थी. बारिश के कारण ट्रकवाला आगे नहीं जा रहा है. बारिश बंद होने के बाद जायेगा. मैंने खिड़की के पास आपको बैठे देखा तो चली आई. बारिश रुकने तक आप शरण दे दें तो....
''कोई बात नहीं अंदर आ जाओ'' दादामुनी ने उसे अंदर आने दिया फिर अपनी जगह बैठकर व्हिस्की पीने लगे. लड़की भी एक कुर्सी खींचकर उनके पास ही बैठ गयी. वह टकटकी लगाकर व्हिस्की के ग्लास की और देखने लगी.
''पियोगी?'' दादामुनी ने पूछा.
उसने सहमती से सर हिला दिया तो दादामुनी ने एक नया पेग बनाकर उसे दे दिया.
बारिश रुकने पर वह इजाजत लेकर बहार चली गयी. दादामुनी ने उसे ट्रक की तरफ जाते हुए देखा. ट्रक के पास पहुँचने पर  ट्रक ड्राईवर से उसे कुछ बातें करते हुए देखा. फिर उन्होंने देखा कि ट्रकवाले ने अचानक चाकू निकाला  और लड़की के सीने में घोंप दिया. लड़की सड़क पर गिरकर छटपटाने लगी और ट्रक वाला ट्रक लेकर भाग निकला. दादामुनी दौड़ते हुए वहां गए तो देखा लड़की मर चुकी है. वे अपनी कार से तुरंत थाना पहुंचे और थानेदार को घटना की जानकारी दी. थानेदार ने कहा कि वह उनका बहुत बड़ा फैन है. दादामुनी ने उसे घटनास्थल पर चलने को कहा. तभी एक सिपाही बोला कि वहां कोई क़त्ल नहीं हुआ है. जिस जगह की बात हो रही है वहां कई लोगों ने इस घटना की रिपोर्ट की है लेकिन वहां कुछ नहीं मिलता यह सब प्रेतलीला है.
दादामुनी के आग्रह करने पर सिपाही और दारोगा उनके साथ गए लेकिन दादामुनी यह देखकर दांग रह गए कि वहां न कोई लाश थी न खून के निशान. उन्हें मान लेना पड़ा कि सिपाही सच कह रहा था.
सिपाही ने कहा कि बहुत साल पहले इस जगह पर सही में एक लड़की का क़त्ल किसी ट्रकवाले ने किया था. उसकी आत्मा आज भी भटकती है और इसी तरह बरसात के मौसम में वह दिखाई पड़ती है.

-----प्रस्तुति: छोटे

Wednesday, 24 August 2011

रात की सवारी


रात के दो बज रहे थे. जोरों की बारिश हो रही थी. घना अँधेरा था. बादल रह-रहकर गरज रहे थे. थोड़ी-थोड़ी देर पर बिजली चमकती तो आस-पास की चीजें दिखाई पड़ती थीं अन्यथा हाथ को हाथ दिखना भी मुश्किल लग रहा था.  झारखंड के घाटशिला स्टेशन के बाहर रामदीन अपना ऑटो लगाये सवारी का इंतजार कर रहा था. इस मौसम में सवारी मिलने की उम्मीद कम थी फिर भी हो सकता था कुछ देर बाद आनेवाली ट्रेन से कोई सवारी आ जाये. करीब एक घंटे बाद ट्रेन आई. थोड़ी देर बाद बिजली चमकने पर एक 18 -१९ वर्ष की मॉडर्न सी लड़की कंधे पर एक बैग लटकाए बाहर निकलती दिखी. वह सीधे उसके ऑटो के पास पहुंची और मुसाबनी चलने को कहा. रामदीन ने कहा कि रात का वक़्त है इसलिए  वहां चलने पर पांच सौ रूपये लूँगा. नहीं तो दो चार घंटे इंतज़ार कर लीजिये सुबह सौ रुपये में ले चलूँगा. लड़की बोली-अभी दो सौ रुपये रखो बाकी वहां पहुँच कर दूंगी. और ऑटो पर बैठ गयी.

Thursday, 18 August 2011

खौफनाक हथेली


करीब 50 वर्ष पहले की बात है. नवीनचंद्र लखनऊ विश्वविध्यालय का छात्र था और  हॉस्टल में रहता था. एक दिन वह अपने कुछ दोस्तों के साथ नाईट शो फिल्म देखने गया. फिल्म ख़त्म होने के बाद दोस्तों के साथ चाय पीता और बातें करता रहा. तभी एक दोस्त ने कहा-'नवीन! रात के डेढ़ बज चुके हैं. तुम्हें अकेले हॉस्टल जाना है. हम तो शहर में ही रह जायेंगे. तुम निकल लो या फिर हमारे साथ रह जाओ सुबह चले जाना.'
नवीन ने कहा- 'नहीं..रुकूंगा नहीं मेरा रूम पार्टनर परेशान हो जायेगा.'
'जाओगे कैसे कोई रिक्शा भी नज़र नहीं आ रहा है.'

Monday, 15 August 2011

भूतों के चक्कर में

 डा. एकेबी सिन्हा ने एकबार बक्सर से आरा आने के दौरान प्रेतों से साक्षात्कार से संबंधित एक आपबीती कहानी सुनाई थी. उन दिनों वे छपरा सदर अस्पताल में पदस्थापित थे. एक रोज की बात है. अस्पताल से रात करीब 12 बजे घर लौटे थे. तेज़ बारिश हो रही थी. उन्होंने अभी अपने कपडे भी नहीं बदले थे कि दरवाजे पर जोरों की दस्तक होने लगी. मैंने दरवाज़ा खोला तो देखा एक 20 -22  साल की लड़की खडी है. उसने बताया कि उसके पिताजी की तबीयत बहुत ख़राब है मैं चलकर देख लूं. मैंने उसे बताया कि मैं रात में मरीज नहीं देखता. इसपर वह बहुत गिडगिडाने लगी. मेरी पत्नी को दया आ गयी. उसने कहा कि इतना कह रही है तो जाकर देख लीजिये. मैं अनमना सा बाहर निकला अपनी कार निकली और उसे बैठने का इशारा किया.